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चित्रकूट की रामलीला में रूस से लेकर दक्षिण भारत तक की संस्कृति का संगम

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वनगमन, केवट प्रसंग और भरत मिलाप का भावपूर्ण मंचन

चित्रकूट। भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट में रामकथा के जरिए देश-विदेश की सांस्कृतिक परंपराएं एक मंच पर साकार हो रही हैं। राघव प्रयाग घाट पर मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग और श्रीरामचन्द्र पथ गमन न्यास के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय श्रीरामलीला उत्सव में कलाकार संगीत, नृत्य, संवाद और अभिनय के माध्यम से रामचरित के विविध प्रसंगों को जीवंत कर रहे हैं। 13 से 19 अक्टूबर तक चलने वाले इस उत्सव में प्रतिदिन शाम 6:30 बजे से प्रस्तुतियां हो रही हैं।

महोत्सव के तीसरे दिन राम-सीता-लक्ष्मण के वनगमन, केवट प्रसंग, भरत मिलाप और खर-दूषण वध का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा, प्रभावशाली संवाद और अभिनय के जरिए प्रसंगों को मंच पर साकार किया। रामकथा के इन दृश्यों ने दर्शकों को भगवान श्रीराम के आदर्शों, त्याग और मर्यादा से परिचित कराया।

कार्यक्रम का शुभारंभ महंत वरुण प्रपन्नाचार्य, महंत आनंद दास, जिला पंचायत अध्यक्ष अशोक जाटव, सहकारी बैंक बांदा-चित्रकूट के अध्यक्ष पंकज अग्रवाल, उज्जैन के वरिष्ठ रंगकर्मी विजेंद्र यादव, विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष राजेंद्र त्रिवेदी, सतना के भाजपा जिला उपाध्यक्ष राव प्रवल श्रीवास्तव और चित्रकूट नगर अध्यक्ष रवि गुप्ता ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। जिलाधिकारी पुलकित गर्ग भी उपस्थित रहे और उन्होंने कलाकारों का अभिनंदन किया।

इस आयोजन की खासियत इसकी अंतरराष्ट्रीय भागीदारी है। रूस से आई मंडली भी रामलीला के प्रसंग प्रस्तुत कर रही है। वहीं, देश के विभिन्न राज्यों से आई मंडलियां अपनी क्षेत्रीय कला परंपराओं के जरिए रामकथा के अलग-अलग रूपों से दर्शकों को परिचित करा रही हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की मंडलियां यक्षगान और भागवतम् शैली में प्रस्तुतियां देंगी।

भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में रामलीला सदियों से धार्मिक आस्था और लोककला का महत्वपूर्ण माध्यम रही है। रामजन्म, बाललीला, वनवास, चित्रकूट प्रवास, सीता हरण, हनुमान भक्ति, लंका विजय और अयोध्या वापसी जैसे प्रसंगों के मंचन के जरिए श्रीराम के जीवन-मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय श्रीरामलीला उत्सव इसी परंपरा को वैश्विक सांस्कृतिक संवाद से जोड़ रहा है।

रामकथा के विविध रंग

रूस सहित देश-विदेश की मंडलियां अपनी कला के जरिए रामलीला के अलग-अलग रूप प्रस्तुत कर रही हैं। दक्षिण भारत की यक्षगान और भागवतम् शैलियां उत्सव को विशेष सांस्कृतिक पहचान देंगी।

19 अक्टूबर तक चलेगा उत्सव

राघव प्रयाग घाट पर प्रतिदिन शाम 6:30 बजे से रामलीला का मंचन हो रहा है। सात दिवसीय अंतरराष्ट्रीय आयोजन में दर्शकों को रामकथा, संगीत, नृत्य और अभिनय की विविध परंपराएं देखने का अवसर मिल रहा है।



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